हिंदी वर्तनी का मानकीकरण
Updated: Sep 21

किसी भी भाषा के सीखने-सिखाने में सहायक या बाधक बनने वाले दो प्रमुख कारक हैं — भाषा का व्याकरण और उसकी लिपि। लिपि का एक पक्ष है — सामान्य और विशिष्ट स्वनों के पृथक प्रतीक वर्णों की स्पष्टता, उनका परस्पर स्पष्ट आकार-भेद, लिखावट में सरलता, स्थान-लाघव एवं प्रयत्न-लाघव।
लिपि का दूसरा पक्ष है — वर्तनी। एक ही स्वन को प्रकट करने के लिए विविध रूपी वर्णों का प्रयोग वर्तनी को जटिल बना देता है और यह लिपि का एक सामान्य दोष माना जाता है। यद्यपि देवनागरी लिपि में यह दोष बहुत कम है, फिर भी उसकी अपनी कुछ विशिष्ट कठिनाइयाँ भी हैं।
इन सभी कठिनाइयों को दूर करने के उद्देश्य से केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने वर्तनी के मानकीकरण के लिए कुछ नियम बनाए, जो इस प्रकार हैं :
1. संयुक्त वर्ण
1.1.1 खड़ी पाई वाले व्यंजन
खड़ी पाई वाले व्यंजनों के संयुक्त रूप परंपरागत तरीके से खड़ी पाई को हटाकर ही बनाए जाएँ, जैसे —
ख्याल, व्याकरण, श्लोक, ध्वनि, न्याय, प्यारा, त्र्यंबक, स्वीकार, लग्न, विघ्न, कच्चा, छज्जा, कुत्ता ( दो अर्ध त (त्त) के साथ आने पर स्थान लाघव को देखते हुए उसका परंपरागत रीति से संयुक्त रूप बनाया जाए, जैसे— महत्त्व, तत्त्व), कथ्य, डिब्बा, सभ्य, रम्य, यक्ष्मा।
1.1.2 अन्य व्यंजन
1.1.2.1 क और फ / फ़ के हुक के आधे भाग को हटाकर संयुक्ताक्षर बनाए जाएँ, जैसे —
संयुक्त, पक्का, दफ्तर।
1.1.2.2 ड, छ, ट, ठ, ड, ढ और ह के संयुक्ताक्षर हल चिह्न लगाकर बनाए जाएँ, जैसे — वाङ् मय, उच्छ् वास, लट्टू, बुड् ढा, चिह् न, ब्रह् मा।
लेकिन आधे द (द्) के साथ य और व आने पर हलंत के स्थान पर संयुक्त व्यंजन बनाने के परंपरागत रूप को प्राथमिकता दी जाए, जैसे —विद्या, विद्यालय, विद्यमान, द्विवेदी, द्विधा।
1.1.2.3 संयुक्त 'र' के प्रचलित तीनों रूप यथावत रहेंगे, जैसे— प्रकार, धर्म, राष्ट्र।
संयुक्ताक्षर में 'र्' यदि पहला वर्ण हो तो 'रेफ'(कर्म) में परिवर्तित होगा और दूसरा होने पर वर्ण के नीचे (क्रम) लगेगा। 'ट' और 'ड' के बाद संयुक्त होने पर 'ट्र' और 'ड्र' रूप बनता है। जैसे — ट्रक ड्रम
1.1.2.4 'श्र' का यही प्रचलित रूप मान्य होगा। श के साथ 'र' के संयोग से श्र (श्रद्धा) और 'ऋ' के संयोग से (शृंगार) रूप बनते हैं। त्+र के संयुक्त रूप के लिए 'त्र' ही मानक माना जाएगा। श्र और त्र के अतिरिक्त अन्य व्यंजन + र के संयुक्ताक्षर निम्नानुसार बनेंगे। जैसे — क्र - क्रूर, ग्र- ग्रह, , ब्र - ब्रह्मा, स्र - सहस्र, ह्र - ह्रास आदि।
1.1.2.5 हल चिह्न युक्त वर्ण से बनने वाले संयुक्ताक्षर के साथ आने वाली हृस्व 'इ' की मात्रा को शब्द युग्म के पूर्व से लगाते हुए पूर्ण व्यंजन तक ले जाया जाए,
जैसे —कुट्टिम (ट् +ट) , चिट्ठियाँ (ट्+ठ), बुद्धिमान (द्+ध) , चिह्नित (ह्+न)
1.2 कारक- चिह्न/ परसर्ग
1.2.1 हिंदी के कारक चिह्न सभी प्रकार के संज्ञा शब्दों में प्रातिपदिक से पृथक् लिखे जाएँ, जैसे— राम ने, राम को, राम से, राम का, स्त्री से, सेवा में आदि। सर्वनाम शब्दों में ये चिह्न प्रातिपदिक के साथ मिलाकर लिखे जाएँ,
जैसे —तूने, आपने, तुमसे, उसने, उसको, उससे, मुझको, मुझसे आदि।
सर्वनामों के साथ यदि दो कारक-चिह्न हों तो उनमें से पहला मिलाकर और दूसरा पृथक लिखा जाए, जैसे— उसके लिए, इसमें से।
1.2.2 सर्वनाम और कारक - चिह्न के बीच 'ही' 'तक' आदि निपात हों (ऐसे शब्द हैं जो किसी शब्द के साथ लगकर उसके अर्थ को बल प्रदान करते हैं, उसे निपात कहते हैं। इन शब्दों को निपात अवधारक भी कहते हैं। इस तरह के शब्द किसी खास बात पर जोर देकर कहने के लिए प्रयोग किया जाता है।) तो कारक चिह्न को पृथक लिखा जाए, जैसे — आप ही के लिए, मुझ तक को आदि।
यह किताब आप ही के लिए है।
यह बात मुझ तक को नहीं पता।
1.3 संयुक्त क्रियापद
संयुक्त क्रियापदों में सभी अंगीभूत क्रियाएँ पृथक-पृथक लिखी जाएँ, जैसे —
पढ़ा करता है, आ सकता है, जाया करता है, खाया करता है, जा सकता है, कर सकता है, किया करता था, पढ़ा करता था, खेला करेगा, घूमता रहेगा, बढ़ते चले जाओ, बढ़ते चले जा रहे हैं आदि।
1.4 हाइफ़न /योजक चिह्न (-)
1.4.0 योजक चिह्न (हाइफ़न) का विधान (प्रयोग) स्पष्टता के लिए किया जाता है।
1.4.1 द्वंद्व समास में पदों के बीच हाइफ़न रखा जाए, (द्वंद्व समास वह समास होता है जिसमें दोनों पद (पूर्व पद और उत्तर पद) प्रधान होते हैं, और विग्रह करने पर उनके बीच 'और', 'या', 'अथवा', या 'एवं' जैसे योजक शब्द लगते हैं। समस्त पद में आमतौर पर दोनों शब्दों के बीच योजक चिह्न (-) लगा होता है।)
जैसे—
राम-लक्ष्मण (राम और लक्ष्मण) ,
शिव-पार्वती संवाद,
देख-रेख (देखना और सँभालना),
चाल-चलन ('चाल' (गतिविधि/तौर-तरीके) और 'चलन' (रीति-रिवाज/आचरण),
हँसी-मजाक (हँसी और मजाक),
लेन-देन (लेन और देन / लेना या देना),
खेलना-कूदना (खेलना और कूदना),
उठना-बैठना (उठना और बैठना),
आगे-पीछे (आगे और पीछे / आगे या पीछे)
पढ़ना-लिखना (पढ़ना और लिखना),
अच्छा-बुरा (अच्छा या बुरा) आदि।
1.4.2 समानता सूचक सा, से, सी आदि से पूर्व हाइफन रखा जाए। जैसे —
तुम-सा (सुंदर), चाकू-सी (जुबान)।
चाँद-सा मुखड़ा (चाँद के समान सुंदर)
फूल-सी कोमल (फूल के समान मुलायम)
मोती-से दाँत (मोतियों के समान चमकदार)
1.4.3 तत्पुरुष समास में हाइफ़न का प्रयोग केवल वहीं किया जाए जहाँ उसके बिना भ्रम होने की संभावना हो, अन्यथा नहीं। जैसे— भू-तत्त्व।
आत्म-हत्या , आत्म-ज्ञान (जहाँ 'आत्म' के साथ भ्रम न हो, वहाँ 'आत्महत्या' भी लिखा जाता है, किंतु जब दूसरा पद जटिल हो जैसे - आत्म-निर्भरता, आत्म-सम्मान तो हाइफ़न से अर्थ तुरंत स्पष्ट हो जाता है)।
सामान्यत: तत्पुरुष समास में हाइफ़न लगाने की आवश्यकता नहीं है, जैसे — रामराज्य, राजकुमार, गंगाजल, ग्रामवासी, आत्महत्या आदि।
1.4.4 कठिन संधियों से बचने के लिए भी हाइफ़न का प्रयोग किया जा सकता है। जैसे — द्वि-अक्षर, द्वि-अर्थ, त्रि-अक्षर आदि।
जहाँ संधि का कोई झंझट या उच्चारण-भ्रम न हो, वहाँ हाइफ़न नहीं लगाया जाता।
जैसे— त्रिभाषा, यहाँ त्रि-भाषा नहीं होगा।
किंतु, नामवाची समस्त पदों पर यह नियम लागू नहीं होगा, जैसे— त्र्यंबक ।
1.5 अव्यय
1.5.1 'तक', 'साथ', आदि अव्यय सदा पृथक लिखे जाएँ, जैसे— यहाँ तक, आपके साथ।
'तक' के उदाहरण
रात तक (न कि राततक)
दिल्ली तक (न कि दिल्लीतक)
अब तक (न कि अब तक को मिलाकर)
मुझ तक (न कि मुझतक)
शाम तक (न कि शामतक)
वहाँ तक (न कि वहाँतक)
'साथ' के उदाहरण
मेरे साथ (न कि मेरेसाथ)
पिताजी के साथ (न कि पिताजी केसाथ)
बच्चों के साथ (न कि बच्चों केसाथ)
उनके साथ (न कि उनकेसाथ)
सच्चाई के साथ (न कि सच्चाई केसाथ)
1.5.2 आह, ओह, अहा, ऐ, ही, तो, सो, भी, न, जब, तब, कब, यहाँ, वहाँ, कहाँ, सदा, क्या, श्री, जी, तक, भर, मात्र, साथ, कि, किंतु, मगर, लेकिन, चाहे, या, अथवा, तथा, यथा, और आदि अनेक प्रकार के भावों का बोध कराने वाले अव्यय हैं। कुछ अव्ययों के आगे परसर्ग (कारक - चिह्न) भी आते हैं, जैसे— अब से, तब से, यहाँ से, वहाँ से, सदा से, आदि। नियम के अनुसार अव्यय सदा पृथक लिखे जाने चाहिए। जैसे — आप ही के लिए, मुझ तक को, आपके साथ, गज भर कपड़ा, देश भर, रात भर, दिन भर, वह इतना भर कर दे, मुझे जाने तो दो, काम भी नहीं बना, पचास रुपए मात्र आदि।
1.5.3 सम्मानजनक 'श्री' और 'जी' अव्यय (वह शब्द जिसके रूप में वचन, लिंग आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता।) भी पृथक् लिखे जाएँ। जैसे — श्री राम, श्री कन्हैयालाल जी, महात्मा जी आदि। (यदि श्री, जी आदि व्यक्तिवाचक संज्ञा के ही भाग हों तो मिलाकर लिखे जाएँ, जैसे — श्रीराम, रामजी लाल, आदि)।
1.5.4 समस्त पदों में प्रति, मात्र, यथा आदि अव्यय जोड़कर लिखे जाएँ (अर्थात् पृथक् नहीं लिखे जाएँ), जैसे— प्रतिदिन, प्रतिशत, मानवमात्र, निमित्तमात्र, यथासमय, यथोचित आदि। यह सर्वविदित नियम है कि समास होने पर समस्त पद एक माना जाता है। अत: उसे पृथक रूप में न लिखकर एक साथ लिखना ही संगत है।
'दस रुपये मात्र' 'मात्र दो व्यक्ति' में पदबंध की रचना है। यहाँ 'मात्र' अलग से लिखा जाए (अर्थात् मिलाकर नहीं लिखें)
1.6 अनुस्वार (ं) और अनुनासिक (चंद्रबिंदु) (ँ)
1.6.0 अनुस्वार व्यंजन है और अनुनासिक स्वर का नासिक्य अभिलक्षण। हिंदी में ये दोनों अर्थभेदक भी हैं। अत: हिंदी में अनुस्वार (ं) और अनुनासिक चिह्न (ँ) दोनों ही प्रचलित रहेंगे।
1.6.1 अनुस्वार (शिरोबिंदु (ं) )
1.6.1.1 संस्कृत शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग अन्य वर्गीय वर्णों ('य' से 'ह' तक) से पहले यथावत रहेगा, जैसे —संयोग, संरक्षण, संलग्न, संवाद, अंश, कंस, सिंह आदि।
1.6.1.2 संयुक्त व्यंजन के रूप में जहाँ पंचम वर्ण (पंचमाक्षर) के बाद सवर्गीय शेष चार वर्णों में से कोई वर्ण हो तो एकरूपता के लिए अनुस्वार का ही प्रयोग करना चाहिए, जैसे— पंकज, गंगा, चंचल, कंजूस, कंठ, ठंडा, संत, संध्या, मंदिर, संपादक, संबंध आदि। (कण्ठ, ठण्डा, सन्त, मन्दिर, सन्ध्या, सम्पादक वाले रूप नहीं) कोष्ठक में रखे हुए रूप संस्कृत के उद्धरणों में ही मान्य होंगे।
1.6.1.3 यदि पंचमाक्षर (पंचम वर्ण) के बाद किसी अन्य वर्ग का कोई वर्ण आए तो पंचमाक्षर अनुस्वार के रूप में परिवर्तित नहीं होगा, जैसे— वाङ् मय,अन्य, चिन्मय, उन्मुख, आदि (वांमय, अंय, चिंमय, उंमुख आदि रूप ग्राहय नहीं होंगे)
1.6.1.4 पंचम वर्ण यदि द्वित्व रूप में (साथ-साथ) आए तो पंचम वर्ण अनुस्वार में परिवर्तित नहीं होगा, जैसे —अन्न, सम्मेलन, सम्मति आदि। (अंन, संमेलन, संमति रूप ग्राहय नहीं होंगे)।
1.6.1.5 संस्कृत के कुछ तत्सम शब्दों के अंत में अनुस्वार का प्रयोग 'म्' का सूचक है, जैसे — अहं (अहम्), एवं (एवम्), शिवं (शिवम्)।
1.6.2 अनुनासिक चिह्न (चंद्रबिंदु)
1.6.2.1 हिंदी के शब्दों में उचित ढंग से चंद्रबिंदु का प्रयोग अनिवार्य होगा।
1.6.2.2 अनुनासिक चिह्न व्यंजन नहीं है, स्वरों का ध्वनिगुण है। अनुनासिक स्वरों के उच्चारण में मुंह और नाक से भी हवा निकलती है। जैसे — आँ, ऊँ, एँ, माँ, हूँ, आएँ, माँगें।
1.6.2.3 चंद्रबिंदु के प्रयोग के बिना प्राय: अर्थ में भ्रम की संभावना रहती है। जैसे — हंस / हँस, अंगना / अँगना, स्वांग(स्व+अंग) / स्वाँग आदि में। अतएव ऐसे भ्रम को दूर करने के लिए चंद्रबिंदु का प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए।
1.6.2.4 हिंदी में चंद्रबिंदु का प्रयोग केवल तद् भव और देशज शब्दों के साथ होता है। जैसे — आँख, चाँद, आँत, दाँत, गाँठ।
1.6.2.5 अनुस्वार एवं अनुनासिक के प्रयोग में आधारभूत अंतर
अनुस्वार और अनुनासिक के प्रयोग को लेकर प्रायः बहुधा भ्रम की स्थिति रहती है और इसलिए समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और कभी- कभी तो पाठ्यपुस्तकों में भी अनुनासिक के स्थान पर भी अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है।
क) इन नासिक्य व्यंजन (ङ, ञ,ण, न, म) के बाद यदि कोई सवर्गीय वर्ण आए तो नासिक्य व्यंजन अनुस्वार के रूप में अपने पूर्ववर्ती वर्ण के ऊपर आ जाते हैं। जैसे — चञ्चल - चंचल ; गङ्गा - गंगा ; पण्डित - पंडित।
ख) ऐसे शब्दों में जहाँ स्वर मात्राएँ शिरोरेखा के ऊपर लगती हैं वहाँ स्थानलाघव के कारण चंद्रबिंदु के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग किया जाता है। जैसे — क्यों (क्योँ) , खींचना (खीँचना), मैं (मैँ), नहीं (नहीँ) ।
हिंदी में अकारांत, आकारांत, इकारांत,ईकारांत,उकारांत एवं ऊकारांत स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन रूपों में चंद्रबिंदु का ही प्रयोग होता है। जैसे — लड़कियाँ, लताएँ, चींटियाँ , नदियाँ, महिलाएँ, ऋतुएँ, वस्तुएँ, वधुएँ, रीतियाँ।
ग) अनुस्वार और चंद्रबिंदु में आधारभूत अंतर उच्चारण का ही है। अनुस्वार में साँस जहाँ नासिका से निकलती है वहीं अनुनासिक में नासिका और मुँह दोनों से निकलती है।
1.7 विसर्ग (:)
1.7.1 संस्कृत के जिन शब्दों में विसर्ग का प्रयोग होता है, वे शब्द यदि संधि या समास के साथ तत्सम रूप में प्रयुक्त हों तो विसर्ग का प्रयोग अवश्य किया जाए, जैसे— 'दु:खानुभूति', दुःखांतदुखांत। यदि उस शब्द के तद्भव रूप में विसर्ग का लोप हो चुका हो तो उस रूप में विसर्ग के बिना ही लिखा जाएगा, जैसे:- 'दुख-सुख के साथी'।
1.7.2 तत्सम शब्दों के अंत में प्रयुक्त विसर्ग का प्रयोग अनिवार्य है,जैसे — अत:, पुन:, स्वत:, प्राय:, पूर्णत:, मूलत:, अंतत:, वस्तुत:, क्रमश:, आदि।
1.7.3. संस्कृत के जिन तत्सम शब्दों में विसर्ग के बाद श, ष, स आने पर विसर्ग का द्वित्व (श्श, स्स) हो जाता है, वहाँ द्वित्व वाले रूप को छोड़कर विसर्गयुक्त रूप को ही प्राथमिकता/मान्यता दी गई है क्योंकि जनसामान्य के उच्चारण और लेखन में विसर्गयुक्त रूप अधिक सहज, स्पष्ट और मूल स्रोत के अनुकूल माना गया है। जैसे —
मानक रूप अशुद्ध रूप
निःस्वार्थ निस्स्वार्थ,
निःशेष निश्शेष ,
निःसंतान निस्संतान, आदि ।
1.7.3.1 शेष स्थानों पर जैसे — अंतःकरण, अन्तःपुर, आदि शब्द विसर्ग के साथ ही लिखे जाएँगे।
1.7.3.2 विसर्ग 'ह' का अघोष उच्चरित रूप है, अत: उसके स्थान पर (स) घोष 'ह' का लेखन किसी हालत में न किया जाए (अत:, पुन: आदि के स्थान पर अतह, पुनह आदि लिखना अशुद्ध वर्तनी का उदाहरण माना जाएगा। )
1.7.3.3 दु:साहस/दुस्साहस, नि:शब्द/निश्शब्द के उभय रूप मान्य होंगे।
1.7.3.4 नि:स्वार्थ, अंत:करण, अंत:पुर, प्रात: काल, दुःस्वप्न, निःसंतान आदि शब्द विसर्ग के साथ ही लिखे जाएँ।
1.7.3.5 तद्भव/देशी शब्दों में विसर्ग का प्रयोग न किया जाए। इस आधार पर छ: लिखना ग़लत होगा। छह लिखना ही ठीक होगा।
1.7.3.6 विसर्ग को वर्ण के साथ मिलाकर लिखा जाए, जबकि कोलन चिह्न (उपविराम) शब्द से कुछ दूरी पर हो, जैसे - प्रातः (विसर्ग युक्त शब्द)।
फूल के पर्यायवाची शब्द हैं : सुमन, कुसुम।
1.8 हल् चिह्न (् )
1.8.1 व्यंजन के नीचे लगा 'हल्' चिह्न उस व्यंजन के स्वर रहित होने की सूचना देता है, अर्थात् वह व्यंजन विशुद्ध रूप से व्यंजन है।
1.8.2 संयुक्ताक्षर बनाने के नियम 1.1.2.2 के अनुसार छ , ट, ठ, ड, ढ, ह में 'हल्' चिह्न (ड् छ्, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ह्) का ही प्रयोग होगा, जैसे — चिह्न, बुड्ढा, विद्वान आदि में ।
1.8.3 शब्दों के अंत में आने वाला 'हल्' चिह्न हिंदी की प्रकृति के अनुरूप नहीं है। अतः महान, राजन, तेजस, ओजस जैसे शब्दों में 'हल्' चिह्न का प्रयोग नहीं होगा। इन सभी हलंत शब्दों के व्याकरणिक प्रयोग में नियमों की समुचित व्याख्या के लिए हलंत से दर्शाया जा सकेगा। जैसे — 'जगत' शब्द हिंदी में सामान्यतः बिना 'हल्' चिह्न के ही लिखा जा सकेगा किन्तु, 'जगदीश' शब्द के संधि विच्छेद को दर्शाने के लिए 'जगत्+ईश' में इसे 'हल्' चिह्न के साथ दर्शाया जाएगा।
1.8.3.1 संस्कृत से लिए गए अव्ययों में हलंत मूल भाषा के अनुसार अपरिवर्तित रहेगा। जैसे — अर्थात्, आत्मसात्, पश्चात्, अकस्मात्, प्राक्। मकारांत अव्यय में 'म्' के स्थान पर अनुस्वार लिखा जाएगा। जैसे — स्वयम् - स्वयं ; सायम् - सायं। तत्सम शब्दों का प्रयोग वांछनीय हो तो हलंत रुपों का ही प्रयोग किया जाए, विशेष रूप से तब जब कि उनसे समस्त पद या व्युत्पन्न शब्द बनते हों, यथा:- प्राक्-(प्रागैतिहास), वाक् - (वाग्देवी), तेजस् -(तेजस्वी), विद्युत् -(विद्युल्लता), भगवन् - (भगवद्भक्ति), साक्षात् -(साक्षात्कार)। तत्सम संबोधन में हे राजन्, हे भगवन् रूप ही स्वीकृत होंगे। जिन शब्दों में हल् चिह्न लुप्त हो चुका हो उनमें उसे फिर से लगाने का प्रयत्न न किया जाए। जैसे — महान् विद्वान आदि (क्योंकि हिंदी में अब 'महान' से 'महानता' और 'विद्वानों' जैसे रूप प्रचलित हो चुके हैं।
1.9 अवग्रह ( s)
संस्कृत पदों में संधि के कारण विलुप्त हुए ‘अ’ को प्रदर्शित करने के लिए अवग्रह चिह्न का प्रयोग किया जाता है, जैसे — शिव+अहम् = शिवोऽहम्, सो+अहम् = सोऽहम् आदि। अतः, इस प्रयोजन से अवग्रह चिह्न का प्रयोग यथावत होता रहेगा।
1.10 स्वन परिवर्तन
1.10.1 संस्कृतमूलक तत्सम शब्दों की वर्तनी को ज्यों-का-त्यों ग्रहण किया जाए। अत: 'ब्रह्मा' को 'ब्रम्हा', 'उऋण' को 'उरिण' में बदलना उचित नहीं होगा। इसी प्रकार ग्रहीत, दृष्टव्य, प्रदर्शिनी, अत्याधिक, अनाधिकार आदि अशुद्ध प्रयोग ग्राह्य नहीं हैं। इनके स्थान पर क्रमश: गृहीत, द्रष्टव्य, प्रदर्शनी, अत्यधिक, अनधिकार ही लिखना चाहिए।
जिन तत्सम शब्दों में तीन व्यंजनों के संयोग की स्थिति में एक द्वित्वमूलक व्यंजन लुप्त हो गया है उसे न लिखने की छूट है। जैसे — अर्द्ध-अर्ध, तत्त्व-तत्व आदि।
1.11 'ऐ', 'औ' का प्रयोग
1.11.1 हिंदी में ऐ, औ का प्रयोग दो प्रकार के उच्चारण को व्यक्त करने के लिए होता है। पहले प्रकार का उच्चारण 'है', 'और', आदि में मूल स्वरों की तरह होने लगा है; जबकि दूसरे प्रकार का उच्चारण गवैया, नैया, भैया, कौआ आदि शब्दों में संध्यक्षरों (diphtongs) के रूप में आज भी सुरक्षित है। नियमानुसार 'य' के पहले 'ए' होने से उसका उच्चारण 'अई' के रुप में होगा और व के पहले 'औ' होने पर उसका उच्चारण 'अउ ' के रूप में होगा। दोनों ही प्रकार के उच्चारणों को व्यक्त करने के लिए इन्हीं चिह्नों(ऐ, औ) का प्रयोग किया जाए। 'गवय्या', कव्वा', आदि संशोधनों की आवश्यकता नहीं है। अन्य उदाहरण हैं— भैया, सैयद, तैयार, हौवा, आदि।
1.11.2 दक्षिण के अय्यर, नय्यर, रामय्या, आदि व्यक्तिनामों / कुलनामों को मूल भाषा के अनुरूप लिखा जाए। हिंदी उच्चारण के अनुसार ऐयर, नैयर, रामैया आदि न लिखा जाए, क्योंकि मूल भाषा में इसका उच्चारण भिन्न है।
1.11.3 अव्वल, क़व्वाल, क़व्वाली जैसे शब्द प्रचलित हैं। इन्हें लेखन में यथावत रखा जाए।
1.12 पूर्वकालिक कृदंत प्रत्यय 'कर'
1.12.1 मुख्य क्रिया के साथ आने वाला पूर्वकालिक प्रत्यय 'कर' हमेशा मिलाकर (एक ही शिरोरेखा में) लिखा जाए।
मिल + कर = मिलकर (न कि मिल कर)
पढ़ + कर = पढ़कर (न कि पढ़ कर)
सो + कर = सोकर (न कि सो कर)
जहाँ दो क्रियाएँ मिलकर आ रही हों, वहाँ पहली क्रिया के बाद हाइफ़न लगता है और 'कर' को दूसरी क्रिया के साथ जोड़कर लिखा जाता है।
खा-पीकर (खा + पी + कर)
उठ-बैठकर (उठ + बैठ + कर)
जब एक ही धातु का दोहराव हो, तो बीच में हाइफ़न आता है और अंतिम पद के साथ 'कर' जुड़ता है।
रो-रोकर
हँस-हँसकर
देख-देखकर
'कर' धातु के साथ जब पूर्वकालिक प्रत्यय 'कर' जुड़ता है, तो करकर न बनकर करके बनता है;
इसी प्रकार प्रेरणार्थक में कराकर के स्थान पर कराके रूप मानक बनता है।
1.13 'वाला' प्रत्यय
1.13.1 क्रिया रुपों में 'करने वाला', 'आने वाला', 'बोलने वाला' आदि को अलग लिखा जाए, जैसे —
जाने वाला (न कि जानेवाला)
आने वाला (न कि आनेवाला)
पढ़ने वाला (न कि पढ़नेवाला)
नियम का सार: यदि 'वाला' से ठीक पहले कोई क्रिया (ना-ने-नी रूप) है, तो 'वाला' अलग रहेगा; यदि पहले कोई संज्ञा/स्थान/वस्तु है, तो 'वाला' शिरोरेखा मिलाकर एक साथ लिखा जाएगा।
1.13.2 संज्ञा और विशेषण के योजक प्रत्यय के रूप में 'घरवाला' 'टोपीवाला' (टोपी बेचने वाला), 'दिलवाला', दूधवाला आदि एक शब्द के समान ही लिखे जाएँगे।
'वाला' जब प्रत्यय के रूप में आएगा तब मिलाकर लिखा जाएगा, अन्यथा अलग से। यह वाला, यह वाली, पहले वाला, अच्छा वाला, लाल वाला, कल वाली बात आदि में 'वाला' निर्देशक शब्द है। अत: इसे अलग ही लिखा जाए।
इसी तरह लंबे बालों वाली लड़की, दाढ़ी वाला आदमी आदि शब्दों में भी 'वाला' अलग लिखा जाएगा। इससे हम रचना के स्तर पर अंतर कर सकते हैं। जैसे — गाँववाला - (ग्रामीण), गाँव वाला मकान - (गाँव का मकान),
1.14 श्रुतिमूलक 'य', 'व'
1.14 जहाँ श्रुतिमूलक य, व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ स्वरात्मक रूपों का ही प्रयोग किया जाए,
जैसे :- नई, गई, जाए, खाए, आइए। अर्थात् किए: किये, नई: नयी, हुआ: हुवा आदि में से पहले (स्वरात्मक) रुपों का प्रयोग किया जाए। यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय आदि सभी रुपों और स्थितियों में लागू माना जाए। जैसे—दिखाए गए, राम के लिए, पुस्तक लिए हुए, नई दिल्ली आदि। जहाँ 'य' श्रुतिमूलक व्याकरणिक परिवर्तन न होकर शब्द का ही मूल तत्त्व हो वहाँ वैकल्पिक श्रुतिमूलक स्वरात्मक परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है। जैसे—स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि (अर्थात् यहाँ स्थाई, अव्यईभाव, दाइत्व नहीं लिखा जाएगा)।
1.15 विदेशी ध्वनियाँ
1.15.1 उर्दू शब्द
उर्दू से आए अरबी-फ़ारसी मूलक वे शब्द जो हिंदी के अंग बन चुके हैं और जिनकी ध्वनियों का हिंदी ध्वनियों में रुपांतर हो चुका है, हिंदी रूप में ही स्वीकार किए जा सकते हैं। जैसे — कलम, किला, दाग आदि (क़लम, क़िला दाग़ नहीं)। नुक्ता हिंदी में प्रचलित नहीं है। अतः, देवनागरी की मूल हिंदी वर्णमाला में नुक्ते को नहीं रखा जाना चाहिए।
उर्दू के मूल पाठ/साहित्य का लिप्यंतरण करने में नुक्ता का प्रयोग चलता रहेगा। उर्दू के जो शब्द हिंदी ने आत्मसात् कर लिए हैं, वहाँ नुक्ते के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं है। जहाँ उनका शुद्ध रूप में प्रयोग अभीष्ट हो अथवा उच्चारणगत भेद बताना आवश्यक हो, वहाँ शुद्धता का ध्यान रखते हुए उनके हिंदी में प्रचलित रुपों में यथास्थान नुक्ते लगाए जाएँ। जैसे —
खाना = भोजन : ख़ाना= जगह ,
राज= राज्य : राज़ = रहस्य,
फन = सांप का फन : फ़न = हुनर आदि।
1.15.2 अंग्रेज़ी शब्द
अंग्रेज़ी के जिन शब्दों में अर्धविवृत 'ओ' ध्वनि का प्रयोग होता है, उनके शुद्ध रूप का हिंदी में प्रयोग अभीष्ट होने पर 'आ' की मात्रा के ऊपर अर्धचंद्र (ऑ) का प्रयोग किया जाए , जैसे —
ऑफिस (Office) — न कि आफिस या ओफिस
कॉलेज (College) — न कि कालेज या कोलेज
डॉक्टर (Doctor) — न कि डाक्टर या डोक्टर
हॉल (Hall) — न कि हाल
मॉल (Mall) — न कि माल
बॉल (Ball) — न कि बाल
जहाँ तक अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं से नए शब्द ग्रहण करने और उनके देवनागरी लिप्यंतरण का संबंध है, अगस्त-सितंबर, 1962 में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा वैज्ञानिक शब्दावली पर आयोजित भाषाविदों की संगोष्ठी में अंतरराष्ट्रीय शब्दावली के देवनागरी लिप्यंतरण के संबंध में की गई सिफ़ारिश उल्लेखनीय है। उसमें कहा गया है कि अंग्रेज़ी शब्दों का लिप्यंतरण इतना क्लिष्ट नहीं होना चाहिए कि उसके वर्तमान देवनागरी वर्णों में अनेक नए संकेत-चिह्न लगाने पड़ें।
सभी विदेशी भाषाओं से आगत शब्दों का देवनागरी लिप्यंतरण यथासंभव विदेशी भाषाओं के मानक उच्चारण के अधिक से अधिक निकट होना चाहिए।
1.16 अन्य नियम
1.16.1 शिरोरेखा (overhead line) का प्रयोग आवश्यक है।
1.16.2 पूर्ण विराम (।) को छोड़कर हिंदी में शेष विरामादि चिह्न वही ग्रहण कर लिए गए हैं जो अंग्रेज़ी में प्रचलित हैं, जैसे —
अल्पविराम (Comma) | , | वाक्य में बहुत थोड़े ठहराव हेतु |
अर्धविराम (Semicolon) | ; | अल्पविराम से अधिक और पूर्ण विराम से कम ठहराव |
उपविराम (Colon) | : | किसी कथन को उद्धृत या रेखांकित करने से पूर्व |
प्रश्नवाचक चिह्न (Question Mark) | ? | जिज्ञासा या प्रश्न पूछने वाले वाक्यों के अंत में |
विस्मयसूचक चिह्न (Exclamation Mark) | ! | हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य आदि मनोभावों पर |
उद्धरण चिह्न (Quotation Marks) | ‘ ’ तथा “ ” | इकहरा (किसी पुस्तक/उपनाम हेतु) एवं दुहरा (कथन हेतु) |
योजक चिह्न (Hyphen) | - | द्वंद्व समास, सामासिक पदों या तुलनात्मक 'सा/से/सी' हेतु |
निर्देशक चिह्न (Dash) | — | हाइफ़न से बड़ा; उदाहरण या वार्तालाप दर्शाने हेतु |
विवरण चिह्न (Colon Dash) | :- | आगे दी जाने वाली विस्तृत सूची या विवरण के लिए |
कोष्ठक (Parentheses / Brackets) | ( ), { }, [ ] | कठिन शब्द का अर्थ या अतिरिक्त सूचना देने हेतु |
लोप चिह्न (Ellipsis) | ... | छोड़े गए अंश या मौन को दर्शाने हेतु |
संक्षेपसूचक चिह्न (Abbreviation Mark) | . या ॰ | संक्षिप्त रूप दर्शाने हेतु (जैसे: डॉ., पं॰) |
हंसपद / त्रुटिबोधक (Caret) | ^ | लिखते समय छूटे हुए शब्द को ऊपर जोड़ने हेतु |
ऊर्ध्व अल्पविराम (Apostrophe) | ’ | अक्षरों के लोप या विशिष्ट अंग्रेज़ी नामों के लेखन हेतु |
शब्द चिह्न (Ditto Mark) | („) | पुनरुक्ति सूचक चिह्न |
स्रोत : केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण, संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण, 2024
महोदया, आपने बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी प्रदान की है। इस लेख से न केवल हिंदी के स्कूली छात्रों की व्याकरण बेहतर हो सकती है अपितु इसका लाभ हिंदी विषय वाली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी लिया जा सकेगा। आवश्यकता है कि इस प्रकार की विशिष्ट सामग्री उन तक पहुँचे। अभिनंदन
Very Informative 🙌
ज्ञानवर्धक
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