टिप्पणी लेखन : अर्थ, उद्देश्य, प्रकार और मार्गदर्शक सिद्धांत
टिप्पणी लेखन सरकारी कार्यालयों में कार्य-संपादन और निर्णय-प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है। किसी प्राप्त पत्र अथवा मामले पर क्या कार्रवाई की जानी है, किन नियमों का पालन आवश्यक है, पूर्व में इस प्रकार के मामलों में क्या निर्णय लिए गए हैं तथा अधिकारी से किस निर्णय या आदेश की अपेक्षा है—इन सभी बातों को संक्षेप, स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का माध्यम टिप्पणी है।
सरल शब्दों में, टिप्पणी का उद्देश्य अधिकारी को किसी मामले की पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति, संबंधित नियमों और अपेक्षित कार्रवाई से अवगत कराकर निर्णय लेने में सहायता करना है।
1. आवती से टिप्पणी तक
कार्यालय में प्राप्त होने वाले पत्रों, आवेदनों तथा अन्य कागज-पत्रों को सामान्यतः आवती कहा जाता है। आवती लिपिक प्राप्त डाक को छाँटकर संबंधित अनुभागों में भेजता है। अनुभाग अधिकारी आवश्यकतानुसार महत्वपूर्ण आवतियों को उच्चाधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर उनसे कार्रवाई की दिशा में आदेश या अनुदेश प्राप्त करता है। अन्य आवतियाँ संबंधित सहायकों को कार्रवाई के लिए वितरित की जाती हैं।
संबंधित सहायक आवती के निपटान के लिए उसे फाइल पर प्रस्तुत करता है। सामान्यतः फाइल के दो प्रमुख भाग होते हैं:
टिप्पणी भाग – इसमें मामले से संबंधित टिप्पणियाँ, विचार और सुझाव लिखे जाते हैं।
पत्राचार भाग – इसमें प्राप्त पत्र तथा उनसे संबंधित पत्र-व्यवहार की कार्यालय प्रतियाँ रखी जाती हैं।
नई आवती को पत्राचार भाग में रखा जाता है और उस पर क्रम संख्या अंकित की जाती है। आवती के संदर्भ में क्र.सं. (आवती) तथा कार्यालय से भेजे जाने वाले पत्रों की कार्यालय प्रति के संदर्भ में क्र.सं. (निर्गम) का उल्लेख किया जाता है।
टिप्पणी भाग में संबंधित आवती अथवा निर्गम की क्रम संख्या और पत्राचार भाग की पृष्ठ संख्या का संदर्भ दिया जाता है। इससे टिप्पणी लिखते समय संबंधित पत्र को आसानी से देखा जा सकता है।
2. टिप्पणी लेखन क्या है?
किसी आवती अथवा कार्यालयीन मामले के निपटान के लिए फाइल पर लिखी जाने वाली ऐसी संक्षिप्त और तथ्यपरक अभिव्यक्ति, जिसमें मामले की पृष्ठभूमि, तथ्य, नियम, विश्लेषण, पूर्व निर्णय तथा अपेक्षित कार्रवाई का उल्लेख हो, टिप्पणी कहलाती है।
एक अच्छी टिप्पणी में सामान्यतः निम्नलिखित बातें शामिल होती हैं:
मामले से संबंधित आवश्यक तथ्यों का सार
विचाराधीन विषय या समस्या का स्पष्ट उल्लेख
संबंधित नियमों एवं आदेशों का संदर्भ
पूर्व निर्णय अथवा दृष्टांत, यदि उपलब्ध हो
मामले का विश्लेषण
अपेक्षित कार्रवाई
टिप्पणी लेखक का स्पष्ट सुझाव
टिप्पणी के अंत में संबंधित सहायक या अधिकारी अपने आद्यक्षर/हस्ताक्षर और दिनांक अंकित करके फाइल को सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करता है।
3. टिप्पणी लेखन का प्रयोजन
टिप्पणी लेखन का मुख्य उद्देश्य मामले के निपटान में अधिकारी की सहायता करना है।
यदि किसी आवती के संबंध में कार्रवाई की दिशा पहले से स्पष्ट है, पूर्व निर्णय उपलब्ध है अथवा अधिकारी द्वारा आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं, तो टिप्पणी के साथ उत्तर का मसौदा भी अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है।
इसके विपरीत, यदि मामले में किसी महत्वपूर्ण बिंदु पर अधिकारी के मार्गदर्शन या निर्णय की आवश्यकता है, तो सहायक पहले मामले के तथ्य, नियम और स्थिति स्पष्ट करते हुए टिप्पणी प्रस्तुत करता है। अधिकारी आवश्यकतानुसार उसमें अपने सुझाव जोड़कर मामले को सक्षम उच्चाधिकारी के समक्ष भेज सकता है।
इस प्रकार टिप्पणी एक ऐसी कड़ी का कार्य करती है, जो मामले के तथ्य से निर्णय तक पहुँचने में सहायता करती है।
4. टिप्पणी लेखन के मार्गदर्शक सिद्धांत
एक प्रभावी टिप्पणी केवल तथ्यों का संग्रह नहीं होती, बल्कि संक्षिप्त, तार्किक, निष्पक्ष और निर्णयपरक होती है। टिप्पणी लिखते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
तथ्यात्मकता – टिप्पणी में दिए गए सभी तथ्य, आँकड़े और सूचनाएँ सही एवं सत्यापित होनी चाहिए। किसी तथ्य में त्रुटि या गलतबयानी दिखाई दे तो उसका उल्लेख संयत भाषा में किया जाना चाहिए।
नियमों का उल्लेख – मामले से संबंधित नियम, आदेश, कार्यालय ज्ञापन अथवा प्रचलित कार्यविधि का आवश्यकतानुसार उल्लेख किया जाना चाहिए।
पूर्व निर्णय का संदर्भ – समान प्रकृति के मामले में पहले कोई निर्णय या दृष्टांत उपलब्ध हो, तो उसका संदर्भ निर्णय लेने में सहायक हो सकता है।
अपेक्षित निर्णय की स्पष्टता – टिप्पणी पढ़ने के बाद यह स्पष्ट होना चाहिए कि मामले में किस प्रकार का निर्णय अपेक्षित है।
कार्रवाई का सुझाव – जहाँ आवश्यक हो, टिप्पणी लेखक को की जाने वाली कार्रवाई का स्पष्ट सुझाव देना चाहिए।
संक्षिप्तता – केवल आवश्यक तथ्यों और मुद्दों को शामिल किया जाए। अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए।
विषयानुकूलता – टिप्पणी को वास्तविक मुद्दे तक सीमित रखा जाए। पहले की टिप्पणियों में कही गई बातों को बिना आवश्यकता दोहराना उचित नहीं है।
पूर्ववर्ती सार का उपयोग – यदि फाइल में मामले के तथ्यों का क्रमिक सार पहले से उपलब्ध है, तो उसे दोहराने के बजाय आवश्यक अंश का संदर्भ दिया जाए।
स्वतः पूर्णता – यदि फाइल में तथ्यों का पर्याप्त सार उपलब्ध नहीं है, तो मामला प्रस्तुत करते समय आवश्यक तथ्यों का ऐसा सार दिया जाए कि अधिकारी को पूरी स्थिति समझने के लिए बार-बार फाइल के पिछले पृष्ठ न देखने पड़ें।
संयत भाषा – किसी तथ्य में भूल, त्रुटि या गलतबयानी की ओर संकेत करना हो अथवा किसी मत से असहमति व्यक्त करनी हो, तो भाषा विनम्र और संयत होनी चाहिए। व्यक्तिगत आक्षेप से पूरी तरह बचना चाहिए।
अलग-अलग मुद्दों पर अलग टिप्पणी – यदि किसी मामले में अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे हों और प्रत्येक की अलग-अलग जाँच आवश्यक हो, तो उन्हें अलग-अलग बिंदुओं में प्रस्तुत किया जाए।
मौखिक आदेश की लिखित पुष्टि – सामान्यतः अधिकारियों द्वारा कार्रवाई के संबंध में लिखित अनुदेश दिए जाने चाहिए। विशेष परिस्थिति में मौखिक आदेश के आधार पर कार्रवाई करनी पड़े, तो बाद में उसकी लिखित पुष्टि प्राप्त कर लेना उचित है।
5. तथ्यों का क्रमिक सार
किसी महत्वपूर्ण मामले को प्रस्तुत करते समय अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह कम से कम समय में मामले की पूरी स्थिति समझ सके।
इसके लिए तथ्यों का क्रमिक सार तैयार करना उपयोगी होता है। इसमें मामले से संबंधित प्रमुख घटनाओं, पत्राचार, निर्णयों और कार्रवाई को क्रमवार प्रस्तुत किया जाता है।
इस व्यवस्था का प्रमुख लाभ यह है कि अधिकारी को बार-बार फाइल की पिछली टिप्पणियाँ और पत्राचार देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती तथा निर्णय-प्रक्रिया अधिक सुगम हो जाती है।
6. स्थायी निर्देश फाइल
किसी अनुभाग में बार-बार आने वाले समान प्रकृति के विषयों के लिए स्थायी निर्देश फाइल उपयोगी होती है। इससे संबंधित नियमों, नीतियों और पूर्व आदेशों को व्यवस्थित रूप से उपलब्ध रखा जा सकता है।
स्थायी निर्देश फाइल को सामान्यतः निम्नलिखित भागों में व्यवस्थित किया जा सकता है:
(क) विषय से संबंधित सिद्धांतों और नीतियों का क्रमिक सार।
(ख) विषय से संबंधित आदेशों और निर्देशों की तारीखवार प्रतियाँ।
(ग) आदेश, अधिसूचना आदि जारी करते समय उपयोग किए जाने वाले नमूना प्रपत्र।
जहाँ क्रमिक सार में किसी नियम, आदेश या निर्देश का संदर्भ दिया गया हो, वहाँ आवश्यकतानुसार उसके क्रमांक और तारीख का उल्लेख करना चाहिए।
7. टिप्पणी लेखन के स्तर
सामान्यतः टिप्पणी लेखन का कार्य दो स्तरों पर किया जाता है: सहायक स्तर और अधिकारी स्तर। दोनों स्तरों की टिप्पणियों का उद्देश्य मामले को निर्णय के लिए आगे बढ़ाना है, लेकिन उनकी प्रकृति और प्रस्तुति में अंतर हो सकता है।
सहायक स्तर की टिप्पणी में संबंधित आवती का क्रमांक, पत्राचार भाग की पृष्ठ संख्या तथा मामले से संबंधित आवश्यक तथ्य, नियम और सुझाव दिए जाते हैं।
अधिकारी स्तर की टिप्पणी में सामान्यतः मामले के वास्तविक मुद्दे और निर्णय के लिए आवश्यक बिंदुओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यदि अधिकारी पिछली टिप्पणी से पूर्णतः सहमत है, तो वह अनावश्यक पुनरावृत्ति किए बिना अपनी सहमति व्यक्त कर सकता है।
8. टिप्पणी के प्रमुख प्रकार
आकार, उद्देश्य और संरचना की दृष्टि से टिप्पणी को मुख्यतः तीन रूपों में समझा जा सकता है।
(1) प्रशासनिक या नेमी टिप्पणी
ऐसी टिप्पणियाँ सामान्यतः छोटे और नियमित कार्यालयीन कार्यों से संबंधित होती हैं। इनमें “चर्चा करें”, “फाइल कर दें”, “देख लिया”, “आवश्यक कार्रवाई करें” जैसे संक्षिप्त वाक्यांशों का प्रयोग किया जा सकता है।
इन टिप्पणियों में सूचनात्मकता के साथ-साथ आवश्यकतानुसार निर्देशात्मकता भी होती है और वे सामान्यतः एक-दो वाक्यों तक सीमित रहती हैं।
(2) स्वतः पूर्ण टिप्पणी
स्वतः पूर्ण टिप्पणी ऐसी टिप्पणी होती है जिसमें मामले को समझने के लिए आवश्यक सूचना अपने आप में पर्याप्त होती है। यह किसी विशेष आवती पर आधारित होना आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए:
कार्यभार बढ़ने पर अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता
अतिरिक्त पदों के सृजन का प्रस्ताव
किसी नई व्यवस्था को लागू करने का प्रस्ताव
किसी प्रशासनिक समस्या के समाधान के लिए प्रस्ताव
ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी या सहायक पूरी पृष्ठभूमि, समस्या, वर्तमान स्थिति और प्रस्तावित कार्रवाई को एक ही टिप्पणी में प्रस्तुत करता है।
(3) आवती पर आधारित टिप्पणी
आवती पर आधारित टिप्पणी सहायक स्तर पर ही तैयार की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकारी के समक्ष प्राप्त पत्र और उससे संबंधित मामले का विवरण संक्षेप में प्रस्तुत करना होता है। इसमें सहायक आवती का क्रमांक और पत्राचार भाग का पृष्ठ लिखकर अधिकारी को बताता है कि प्रेषक ने क्या माँग की है, उसका क्या कारण दिया है, नियमों की क्या स्थिति है और माँग का औचित्य कितना है। अंत में वह अपना सुझाव देता है। यदि उसे अधिकारी के अनुमोदन का पूरा विश्वास हो, तो वह उत्तर का मसौदा भी अनुमोदन के लिए साथ में प्रस्तुत कर देता है। इसके पाँच चरणों का विवरण अगले खंड में दिया गया है।
9. आवती पर आधारित टिप्पणी के पाँच चरण
आवती पर आधारित टिप्पणी में निम्नलिखित पाँच चरणों का विशेष महत्व होता है, इसलिए इनका समावेश आवश्यक माना जाता है:
आवती का विषय – प्राप्त पत्र में किस विषय पर कार्रवाई का अनुरोध किया गया है, इसका संक्षिप्त उल्लेख किया जाए।
माँग का कारण – प्रेषक ने अपनी माँग के समर्थन में क्या कारण दिया है, उसे स्पष्ट किया जाए।
नियमों की स्थिति – मामले पर लागू नियम, आदेश या प्रचलित कार्यविधि का उल्लेख किया जाए।
आवती में दी गई माँग का औचित्य – माँग को स्वीकार या अस्वीकार करने के संदर्भ में उपलब्ध तथ्यों और नियमों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जाए।
टिप्पणी लेखक के सुझाव – अंत में मामले में की जाने वाली कार्रवाई का स्पष्ट सुझाव दिया जाए।
वाक्य-साँचे
पहले तीन चरणों में “आवेदन किया है”, “बताया गया है”, “माँग उचित/अनुचित है”, “माँग नियमानुसार है” जैसे वाक्य-साँचों का प्रयोग अधिक होता है।
चौथे और पाँचवें चरण में “किया जा सकता है”, “किया जाए” जैसे वाक्य-साँचों का प्रयोग अधिक किया जाता है।
इन पाँच चरणों के आधार पर टिप्पणी लिखने से अधिकारी को मामले को शीघ्र समझने और उचित निर्णय लेने में सुविधा होती है।
10. टिप्पणी लेखन की भाषा
टिप्पणी की भाषा सरल, स्पष्ट, संक्षिप्त, तथ्यपरक, औपचारिक और निष्पक्ष होनी चाहिए।
टिप्पणी में अनावश्यक विशेषणों, भावनात्मक अभिव्यक्तियों और व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचना चाहिए। जहाँ असहमति व्यक्त करनी हो, वहाँ भी भाषा संयत और कार्यालयीन मर्यादा के अनुरूप होनी चाहिए।
11. निष्कर्ष
टिप्पणी लेखन सरकारी कार्यालयों की निर्णय-प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। प्रभावी टिप्पणी वह है जो अधिकारी को कम से कम समय में मामले की पृष्ठभूमि, तथ्य, नियम, समस्या, विश्लेषण और अपेक्षित कार्रवाई से परिचित करा दे।
अच्छी टिप्पणी न तो अनावश्यक रूप से लंबी होती है और न ही इतनी संक्षिप्त कि मामले की आवश्यक जानकारी छूट जाए। उसका वास्तविक उद्देश्य मामले को स्पष्ट करना और निर्णय लेने में सहायता करना है।
इसलिए टिप्पणी लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसमें आवश्यक तथ्य हों, संबंधित नियमों का उचित संदर्भ हो, विचाराधीन मुद्दा स्पष्ट हो और अंत में अपेक्षित कार्रवाई या सुझाव साफ-साफ सामने आए। यही टिप्पणी लेखन को प्रभावी, उपयोगी और व्यावहारिक बनाता है।
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